कांग्रेस का इजरायल यात्रा पर कड़ा रुख
नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजरायल यात्रा पर केंद्र सरकार को कठोर आलोचना का निशाना बनाया है। पार्टी का कहना है कि जिस समय इजरायली नेतृत्व पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उस समय प्रधानमंत्री की यह यात्रा कई नैतिक मुद्दों को जन्म देती है। कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री की इजरायली समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू के साथ प्रस्तावित मुलाकात पर भी असहमति जताते हुए गाजा की स्थिति पर एक स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है।
जयराम रमेश का स्थिर रुख
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भारत के पूर्व की नीति पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि भारत का रुख हमेशा फिलिस्तीनी मुद्दे पर संतुलित और सिद्धांत आधारित रहा है, लेकिन वर्तमान में यह परंपरा से भिन्न प्रतीत हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि गाजा में हो रहे मानवता के संकट और वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार जैसे विषयों पर भारत को और अधिक स्पष्टता दिखानी चाहिए।
रमेश ने भारत के ऐतिहासिक दायित्व की याद दिलाते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 1960 के गाजा दौरे और बाद में फिलिस्तीन के समर्थन में लिए गए निर्णयों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि भारत ने 1988 में फिलिस्तीन को औपचारिक मान्यता दी, जिससे वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र नीति पेश की गई।
प्रियंका गांधी का गाजा मुद्दा उठाने का आग्रह
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रधानमंत्री से उम्मीद जताई कि वे अपनी यात्रा के दौरान इजरायली संसद नेसेट में गाजा पट्टी की मानवीय स्थिति का जिक्र करेंगे और निर्दोष नागरिकों के लिए न्याय की प्रतिबद्धता व्यक्त करेंगे।
उन्होंने कहा कि भारत का ऐतिहासिक दायित्व है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति, न्याय और मानवता के मूल्यों की रक्षा करता रहे।
सरकार का ध्यान: द्विपक्षीय सहयोग पर
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत और इजरायल के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापार सहयोग को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से की जा रही है। 2017 में मोदी की पहली इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों के संबंधों को “रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा दिया गया था, जिसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है।
राजनीतिक और कूटनीतिक बहस का टकराव
इस मुद्दे ने एक बार फिर भारत की पश्चिम एशिया नीति पर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। एक पक्ष रणनीतिक साझेदारी को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है, जबकि दूसरे पक्ष की मांग है कि मानवीय और ऐतिहासिक दृष्टिकोण का भी ध्यान रखा जाए।

प्रातिक्रिया दे