📌 गांडीव लाइव डेस्क:
आज मराठी सिनेमा को एक बड़ा झटका लगा है। मशहूर अभिनेत्री दया डोंगरे का 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनका जाना केवल मराठी फिल्म उद्योग के लिए नहीं, बल्कि पूरे सांस्कृतिक क्षेत्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है। दया जी ने थिएटर के साथ-साथ छोटे और बड़े पर्दे पर अपनी अद्वितीय प्रतिभा से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। विशेषकर, उनके नेगेटिव किरदारों ने दर्शकों के मन में एक खास स्थान बना लिया था।
उनकी छवि के विपरीत, दया ने सास और खलनायिका जैसे किरदारों को इतनी सहजता से निभाया कि दर्शकों का ध्यान उनके प्रभावशाली अभिनय पर टिक गया। दया डोंगरे का जन्म 11 मार्च 1940 को पुणे में हुआ था। उनके परिवार में कला का गहरा रिश्ता था; उनकी माँ यमुनाबाई मोडक नामी नाट्य अभिनेत्री थीं और नानी शांताबाई मोडक मुंबई की प्रसिद्ध गायक थीं।
दया डोंगरे का समृद्ध अभिनय सफर
दया जी के भीतर बचपन से ही संगीत और अभिनय का जुनून था। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग ली और प्रारंभ में गायिका बनने का सपना देखा। लेकिन किस्मत ने उन्हें अभिनय की ओर मोड़ दिया। स्कूल के दिनों में ही वह नाटकों में भाग लेने लगीं और धीरे-धीरे मराठी थिएटर में खुद को स्थापित किया। शादी के बाद भी, उनके पति शरद डोंगरे ने उनका पूरा समर्थन किया, जो 2014 में निधन हो गए।
नेगेटिव किरदारों की उत्कृष्टता
दया डोंगरे ने मराठी सिनेमा में कई सफल फिल्मों में प्रदर्शन किया। ‘खट्याळ सासू’, ‘नाठाळ सून’, ‘नवरी मिळे नवऱ्याला’ और ‘चार दिवस सासूचे’ जैसी हिट फिल्मों में उनके नेगेटिव किरदार आज भी दर्शकों के जेहन में ताजा हैं। इन भूमिकाओं में उनकी एक्टिंग इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शक उन्हें भूल नहीं पाते। छोटे पर्दे पर भी, उनके अभिनय का जादू कमाल का था, चाहे वह सास-बहू का ड्रामा हो या पारिवारिक संघर्ष।
हिंदी सिनेमा में भी दया जी का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। 1992 में आमिर खान और जूही चावला की सुपरहिट फिल्म ‘दौलत की जंग’ में उन्होंने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। उनके अभिनय की सराहना ने उन्हें दोनों भाषाओं में एक उत्कृष्ट कलाकार के रूप में स्थापित किया। दया डोंगरे की जिंदगी संघर्षों से भरी थी, लेकिन उन्होंने हमेशा सकारात्मकता और संघर्ष के साथ आगे बढ़ने की कोशिश की।

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