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  • बीजेपी ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा, न नेता न सहयोगी करते हैं विश्वास

    बीजेपी ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा, न नेता न सहयोगी करते हैं विश्वास

    कांग्रेस पार्टी में उठापटक, बीजेपी ने उठाए सवाल

    नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी के लिए सोमवार का दिन कई समस्याओं से भरा रहा। प्रमुख नेता मणिशंकर अय्यर ने पार्टी हाई कमान के खिलाफ आवाज उठाई, जबकि असम के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। बोरा ने अपने इस्तीफे में पार्टी नेतृत्व पर उन्हें नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। इसी बीच, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है, उन्हें एक ‘असफल वंशज’ करार देते हुए यह कहा गया कि न तो पार्टी के नेता और न ही सहयोगी उन पर विश्वास करते हैं।

    भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया

    कांग्रेस पार्टी में चल रही उथल-पुथल पर भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कटाक्ष किया। उन्होंने कहा, “तृणमूल कांग्रेस चाहती है कि राहुल को हटाकर ममता को लाया जाए। असम के कांग्रेस नेता भूपेन बोरा का इस्तीफा भी इस स्थिति को दर्शाता है। मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि कांग्रेस केरल में हार रही है।” उनका यह बयान यह सिद्ध करता है कि न केवल गांधी परिवार के नेता बल्कि पार्टी के अन्य सदस्य भी राहुल गांधी को गंभीरता से नहीं लेते हैं।

    आवाजें उठ रही हैं कांग्रेस के भीतर

    भूपेन बोरा ने अपने इस्तीफे को वापस ले लिया, वहीं कांग्रेस पार्टी ने मणिशंकर अय्यर के बयान को लेकर यह स्पष्ट किया कि वह अब पार्टी में नहीं हैं और उनके बयान को पार्टी से नहीं जोड़ा जा सकता। अय्यर ने कहा था कि उन्हें विश्वास है कि केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अपने पद पर बने रहेंगे। कांग्रेस की तरफ से प्रतिक्रिया में अय्यर का नाम लेते हुए कहा गया कि केवल मल्लिकार्जुन खरगे उन्हें पार्टी से निकाल सकते हैं।

    भाजपा का आक्रामक रुख

    कांग्रेस पार्टी की इस स्थिति का फायदा उठाते हुए भाजपा ने हमले का कोई भी अवसर नहीं छोड़ा। प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “कांग्रेस नेताओं ने राहुल गांधी को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। मणिशंकर अय्यर ने उन्हें सार्वजनिक रूप से नकारा।” उन्होंने कहा कि अय्यर और अन्य नेता खुलकर राहुल गांधी के खिलाफ बोल रहे हैं, जो पार्टी के लिए चिंता का विषय है।

    कांग्रेस के पूर्व सांसद मणिशंकर अय्यर के बयान ने पार्टी में हलचल मचा दी, जिसमें उन्होंने पवन खेड़ा और शशि थरूर जैसे नेताओं पर निशाना साधा। इस संदर्भ में कांग्रेस पार्टी की मजबूत प्रतिक्रिया आई, जिसमें अय्यर की पार्टी से दूरी का उल्लेख किया गया। अय्यर ने कहा था कि राजनीति में उनकी स्थिति स्पष्ट है, वह नेहरू और राजीव से जुड़े हैं, लेकिन राहुल गांधी से नहीं।

  • महाराष्ट्र स्थानीय चुनावों में बीजेपी की जीत से विपक्ष और सहयोगी प्रभावित होंगे, शिंदे की चिंताएँ बढ़ सकती हैं

    महाराष्ट्र स्थानीय चुनावों में बीजेपी की जीत से विपक्ष और सहयोगी प्रभावित होंगे, शिंदे की चिंताएँ बढ़ सकती हैं

    महाराष्ट्र में महायुति की जीत: चुनाव परिणाम और प्रभाव

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र में हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के गठबंधन ने 75 प्रतिशत सीटों पर विजय प्राप्त की है। महायुति ने 288 में से 215 निकायों में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। विधानसभा चुनाव के बाद यह भाजपा का लगातार दूसरा सफल चुनावी प्रदर्शन है, जिसमें पार्टी ने 129 अध्यक्ष की कुर्सियों पर कब्जा जमाया है। यह जीत न केवल विपक्ष बल्कि भाजपा के सहयोगी दलों के लिए भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।

    चुनाव प्रक्रिया और परिणाम

    महाराष्ट्र में 286 नगर पंचायतों और नगर परिषदों के लिए दो चरणों में मतदान हुआ, जिसमें 2 दिसंबर और 20 दिसंबर को वोटिंग की गई। इस चुनाव में 246 नगर परिषद और 42 नगर पंचायत शामिल हैं। पहले चरण में 263 निकायों के लिए 67 प्रतिशत और दूसरे चरण में 23 निकायों के लिए 47 प्रतिशत मतदाताओं ने अपना मत दिया। मतगणना रविवार को सुबह से शुरू हुई और देर शाम तक भाजपा, शिवसेना और एनसीपी (अजित पवार) के महायुति ने 215 अध्यक्ष पदों पर जीत दर्ज की। भाजपा ने 129, शिवसेना ने 51 और एनसीपी ने 35 अध्यक्ष पद जीते हैं।

    महायुति के भीतर संघर्ष

    महायुति के घटक दलों भाजपा, शिवसेना और एनसीपी के बीच कई क्षेत्रों में ‘फ्रेंडली फाइट’ भी देखने को मिली। कुछ स्थानों पर इन दलों ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे और प्रतिस्पर्धा की। उदाहरण के तौर पर, कणकवली, दहानू और पालघर में शिवसेना ने भाजपा को हराया, जबकि लोहा में एनसीपी ने भाजपा के उम्मीदवार को पराजित किया। यहां एनसीपी के चुनकर आए अध्यक्ष का नाम शरद पवार है। दूसरी ओर, भाजपा ने वडनगर में शिवसेना पर जीत दर्ज की।

    भाजपा और सहयोगियों के लिए परिणाम

    भाजपा ने स्थानीय चुनाव में लोकसभा या विधानसभा चुनाव जैसे प्रचार-प्रसार किया। इसे एक ऐसा अवसर माना जा रहा है, जिससे पार्टी को यह जानने का मौका मिला है कि वह ‘शत प्रतिशत भाजपा’ के अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रही है या नहीं। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि यह भाजपा के राजनीतिक भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है, जहां पार्टी को अपने सहयोगियों की जरूरत नहीं महसूस होगी।

    विपक्ष की स्थिति

    विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद, स्थानीय चुनाव में विपक्ष की स्थिति में और गिरावट आ सकती है। खासकर बृह्नमुंबई महानगरपालिका के अगले चुनाव से पहले यह चुनौती और भी बढ़ गई है। शिवसेना (यूबीटी) तीन दशकों से अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन स्थानीय चुनाव में उसकी सीटें भी दोहरे आंकड़ों को नहीं छू पाई हैं।

    मुख्यमंत्री का बयान

    महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि यह जीत संगठन और सरकार दोनों के मिलेजुले प्रयास का फल है। उन्होंने विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की बात की और कहा कि उन्होंने अपने अभियान में कभी किसी अन्य नेता या पार्टी की आलोचना नहीं की। फडणवीस ने सकारात्मक विकास एजेंडे पर आधारित चुनाव प्रचार किया और जनसमर्थन के लिए अपने कार्यों और भविष्य की योजनाओं को आधार बनाया।

  • UP: योगी सरकार का ‘जातिवाद विरोधी’ महत्वपूर्ण निर्णय, BJP सहयोगियों में असमंजस

    UP: योगी सरकार का ‘जातिवाद विरोधी’ महत्वपूर्ण निर्णय, BJP सहयोगियों में असमंजस

    📌 गांडीव लाइव डेस्क:

    उत्तर प्रदेश सरकार का जातिवाद के खिलाफ महत्वपूर्ण निर्णय

    उत्तर प्रदेश सरकार ने जाति के आधार पर राजनीतिक रैलियों, वाहनों पर जाति नाम लिखने, और पुलिस रिकॉर्ड में जाति के उल्लेख पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। इस कवायद ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सहयोगी दलों को एक नई चुनौती पेश की है।

    जातिवाद पर अंकुश

    रविवार की रात को जारी किए गए आदेश ने स्पष्ट किया कि जातिवाद के खिलाफ यह कदम उठाया गया है। इस बात की जांच की जा रही है कि क्या इस निर्णय का प्रभाव आगामी चुनावों पर पड़ेगा या नहीं। भाजपाई सहयोगी दल अब इस आदेश को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक रणनीतियों में बदलाव आ सकते हैं।

    राजनीतिक प्रतिक्रिया

    इस प्रतिबंध के बारे में विभिन्न राजनीतिक दलों ने mixed प्रतिक्रियाएँ दी हैं। कुछ नेताओं ने इसे सकारात्मक कदम बताया है, जबकि अन्य का मानना है कि यह निर्णय भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह निर्णय वास्तव में जातिवाद को खत्म करने में सफल होता है या नहीं।

    अगले कदम क्या होंगे?

    राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि यदि यह निर्णय सही तरीके से लागू होता है, तो यह उत्तर प्रदेश में जातिवाद की प्रथा के खात्मे में सहायक हो सकता है। सरकार की ओर से आगामी योजनाओं और नीतियों पर भी नज़र रखी जाएगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जातिगत भेदभाव को समाप्त किया जा सके।

    इस नए निर्णय से यूपी की राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ सकते हैं, जिससे आने वाले विधानसभा चुनावों के परिदृश्य में बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।