📌 गांडीव लाइव डेस्क:
बिहार में हाल ही में हुए चुनावों में मतदान प्रतिशत ने न केवल राजनैतिक परिदृश्य को बदल दिया है, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच गहरी एकता का संकेत भी दिया है। यह पहली बार है जब हमने संगठित और रणनीतिक वोटिंग का एक नया पैटर्न देखा है, जो महागठबंधन के लिए एक नया अवसर पैदा कर सकता है। वहीं, इस एकता का सामना असदुद्दीन ओवैसी के चुनावी प्रभाव से भी हो रहा है।
ओवैसी की राजनीतिक वापसी
ओवैसी, जिन्होंने 2020 में सीमांचल की पांच सीटों पर जीत हासिल की थी, इस बार एक भावनात्मक उभार के साथ लौटे हैं। उनके भाषणों में अपमान के अनुभवों का उल्लेख उनकी राजनीतिक लोकप्रियता को और बढ़ा रहा है। इस बार, खासकर युवा मुस्लिम मतदाता उनके नेतृत्व में एकजुट होते दिख रहे हैं।
महिलाओं की भागीदारी
चुनाव में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया। बूथों पर उनकी कतारें केवल वोटिंग का प्रतीक नहीं, बल्कि सुरक्षा और सुविधा की चाह का भी संकेत थीं। नीतीश कुमार के शासन में कानून-व्यवस्था से संतुष्ट होने के बावजूद, उनके समर्थन का स्तर पहले जैसा नहीं रहा, क्योंकि महिलाओं में एक चिंता बढ़ गई है कि भाजपा के शासन में वे कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह जाएंगी।
ओवैसी की अपमानित छवि का लाभ
बिहार में मुस्लिम राजनीति में नेतृत्व की कमी के बीच, ओवैसी ने चर्चा का विषय बनने में सफलता पाई है। उनकी सभाओं में युवाओं की भारी भीड़ यह दर्शाती है कि उनकी राजनीतिक विचारधारा अब केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सम्मान आधारित भी है।
संगठित मुस्लिम वोट और रणनीतियाँ
पहले चरण के चुनावों से यह स्पष्ट हो रहा है कि मुस्लिम मतदाता अब एक संगठित ताकत बन चुके हैं। उनके सामने मुख्य मुद्दे हैं – सुरक्षा, योजना की निरंतरता, और सामाजिक सम्मान। तेजस्वी यादव ने विभिन्न योजनाओं के वादे के जरिए उन्हें नया भरोसा दिया है, लेकिन ओवैसी के प्रति अपमान में उनकी धारणा सीमांचल की राजनीतिक स्थितियों को प्रभावित कर सकती है।
चुनाव में जातीय और राजनीतिक संदेश
एनडीए और महागठबंधन दोनों ही दलों ने जातीय मुद्दों का राजनीतिकरण किया है, लेकिन मंच पर इसकी चर्चा नहीं की गई। यह दर्शाता है कि कैसे चुनावी रैलियों में विकास के मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि असल राजनीति जाति के आधार पर ही संचालित होती है।






