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  • न्यायालय ने शुल्क विवाद में सख्त रुख अपनाया, वकीलों पर 50,000 रुपये का जुर्माना

    न्यायालय ने शुल्क विवाद में सख्त रुख अपनाया, वकीलों पर 50,000 रुपये का जुर्माना

    केरल हाई कोर्ट का वकीलों पर 50 हजार रुपये का जुर्माना

    नई दिल्ली। केरल उच्च न्यायालय ने वकीलों के आचरण को लेकर कड़ा संदेश देते हुए दो अधिवक्ताओं पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। इन वकीलों ने अपने पूर्व मुवक्किलों से बकाया फीस वसूलने के लिए भूमि अधिग्रहण से संबंधित मामले में अदालत के फैसले पर रोक लगाने की मांग की थी, जिसे अदालत ने अनुचित ठहराया।

    कानूनी प्रक्रिया का सम्मान आवश्यक

    मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बेकू कुरियन थॉमस ने स्पष्ट किया कि कोई भी वकील अपनी फीस वसूलने के लिए न्यायिक प्रक्रिया में रुकावट नहीं डाल सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा व्यवहार न केवल गलत है, बल्कि यह कानूनी पेशे की गरिमा को भी प्रभावित करता है।

    रिट याचिका का उपयोग अनुचित

    कोर्ट ने यह भी बताया कि यदि वकीलों की फीस बकाया है, तो उन्हें इसके लिए सिविल कोर्ट का सहारा लेना चाहिए। उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर कार्यवाही को रोकना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि वकील अपने क्लाइंट पर दबाव बनाने या उन्हें ब्लैकमेल करने का अधिकार नहीं रखते।

    नियुक्ति के बाद हस्तक्षेप की गंभीरता

    अदालत ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि वकीलों ने अपनी नियुक्ति समाप्त होने के बाद भी मामले में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया। न्यायालय के अनुसार, यह स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।

    कार्यवाही में देरी का मामला

    जानकारी के अनुसार, वकीलों द्वारा दायर याचिका के कारण भूमि अधिग्रहण से जुड़ी कार्यवाही कई महीनों तक रुकी रही। वकीलों का कहना था कि उन्होंने वर्षों तक केस लड़ा, लेकिन उन्हें उचित फीस नहीं मिली और बिना उनकी एनओसी के नया वकील नियुक्त कर लिया गया।

    मुवक्किलों के आरोप

    वहीं, मुवक्किलों ने अदालत में कहा कि वकीलों को पर्याप्त भुगतान किया गया था, लेकिन वे लगातार अनुचित मांगें कर रहे थे। इसी कारण उन्हें नया वकील नियुक्त करना पड़ा।

    अदालत की चेतावनी

    उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि वकीलों का आचरण पूरे पेशे की प्रतिष्ठा का निर्धारण करता है। यदि उनके कार्यों के कारण न्याय में देरी होती है या मुवक्किलों को नुकसान पहुंचता है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।

  • अर्शदीप सिंह को ICC द्वारा टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में दंडित किया गया

    अर्शदीप सिंह को ICC द्वारा टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में दंडित किया गया

    अर्शदीप सिंह पर जुर्माना

    नई दिल्ली: भारत के तेज गेंदबाज अर्शदीप सिंह को T20 वर्ल्ड कप फाइनल में न्यूजीलैंड के बल्लेबाज डेरिल मिचेल को गेंद मारने के मामले में मैच फीस का 15 प्रतिशत जुर्माना लगाया गया है। यह कार्रवाई मैच के दौरान व्यवहार के नियमों का उल्लंघन मानते हुए की गई है। अधिक जानकारी की प्रतीक्षा की जा रही है।

  • दिल्ली हाई कोर्ट में बांग्लादेश क्रिकेट टीम पर बैन लगाने की याचिका की सुनवाई

    दिल्ली हाई कोर्ट में बांग्लादेश क्रिकेट टीम पर बैन लगाने की याचिका की सुनवाई

    नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट आयोजनों से बाहर करने की मांग करने वाली जनहित याचिका पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अदालत ने इसे अनुचित बताते हुए याचिकाकर्ता को चेतावनी दी और बड़े दंड लगाने की संभावना भी जताई।

    कोर्ट के आपत्ति के कारण

    मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने मंगलवार को कहा कि यह मामला विदेश नीति से संबंधित है और इसमें निर्णय लेना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से परे है। बेंच ने यह प्रश्न उठाया कि न्यायालय विदेश मंत्रालय की गतिविधियों में कैसे हस्तक्षेप कर सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बांग्लादेश की स्थिति का मूल्यांकन या उस पर कार्रवाई करना भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का कार्य है, न कि न्यायालय का।

    समय बर्बाद करने वाली याचिका

    कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) एक स्वतंत्र संस्था है, तो उस पर भारतीय अदालत के आदेश कैसे लागू हो सकते हैं। बेंच ने कहा कि बिना कानूनी आधार के ऐसी याचिकाएं दाखिल करना न्यायालय का समय बर्बाद करना है। अदालत ने चेतावनी दी कि इस प्रकार की निराधार याचिकाओं पर भारी दंड लगाया जा सकता है।

    याचिकाकर्ता की फटकार

    याचिकाकर्ता ने कुछ पुराने घटनाक्रमों का उल्लेख किया, लेकिन अदालत इससे संतुष्ट नहीं हुई। बीसीसीआई की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी यह सवाल उठाया कि याचिका में आवश्यक पक्षों को शामिल नहीं किया गया। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की कानून समझने की क्षमता पर प्रश्न उठाते हुए फटकार लगाई।

    सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि याचिका में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड और श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड को भी पक्षकार बनाया गया है, जिससे याचिका की गंभीरता पर सवाल खड़े होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि इस तरह की गैर-जिम्मेदार और बिना ठोस आधार वाली याचिकाएं जारी रहीं, तो इन्हें भारी दंड का सामना करना पड़ेगा।

    निर्णय लेने का समय

    सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता ने पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था के कुछ निर्णयों का उल्लेख किया, तो अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। बेंच ने पूछा कि क्या भारत की न्याय व्यवस्था पाकिस्तान की अदालतों के निर्णयों को मान्यता देती है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने भी इस याचिका को तुच्छ और बेबुनियाद बताते हुए कहा कि इसे अदालत में दाखिल नहीं किया जाना चाहिए था।

    याचिका वापस लेने की अनुमति

    अदालत की सख्ती के बाद, याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है और इसे वापस लेने के आधार पर खारिज किया गया। जाते-जाते मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने याचिकाकर्ता से कहा, “कुछ अच्छा काम कीजिए, ऐसी याचिकाएं अदालत में नहीं टिकती।”