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  • जमशेदपुर में रामनवमी: नवरात्रि पर जवारा पूजा विसर्जन, श्रद्धा और उल्लास से मनाया जा रहा है।

    जमशेदपुर में रामनवमी: नवरात्रि पर जवारा पूजा विसर्जन, श्रद्धा और उल्लास से मनाया जा रहा है।

    जमशेदपुर में रामनवमी और नवरात्रि का उल्लास

    जमशेदपुर में रामनवमी और नवरात्रि के अवसर पर जवारा पूजा का विसर्जन श्रद्धा और उल्लास के साथ किया जा रहा है। इस पर्व को मनाने में स्थानीय लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विभिन्न समुदायों के लोग इस अवसर पर एकत्रित हुए और उत्सव के माहौल का आनंद लिया।

    जवारा पूजा का महत्व

    जवारा पूजा का आयोजन नवरात्रि के दौरान होता है, जिसमें भक्तजन विशेष रूप से मातृ शक्ति की आराधना करते हैं। इस पूजा में जवारे, जो कि धान के अंकुरित पौधे होते हैं, का विशेष महत्व होता है। इन्हें श्रद्धा के साथ स्थापित किया जाता है और नवरात्रि के अंत में विसर्जित किया जाता है। यह प्रक्रिया न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक एकता को भी दर्शाती है।

    समुदाय की भागीदारी

    इस पर्व में विभिन्न समुदायों के लोग शामिल हुए। सभी ने मिलकर न केवल पूजा की प्रक्रिया को संपन्न किया, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया। भक्ति गीतों और नृत्यों के माध्यम से श्रद्धालुओं ने अपने श्रद्धा भाव को प्रकट किया।

    सुरक्षा और व्यवस्था

    जवारा विसर्जन के दौरान प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को सुनिश्चित किया। स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने मिलकर व्यवस्था बनाई, ताकि श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े।

    उत्सव का समापन

    जवारा पूजा का विसर्जन समारोह के बाद, स्थानीय लोग एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं देते हुए अपने घरों की ओर लौटे। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि लोगों के बीच एकता और भाईचारे का संदेश भी फैलाता है।

  • हजारीबाग राम नवमी: संसद से विदेशों तक पहचान बना चुका है यह ऐतिहासिक जुलूस

    हजारीबाग राम नवमी: संसद से विदेशों तक पहचान बना चुका है यह ऐतिहासिक जुलूस

    हजारीबाग। झारखंड राज्य के हजारीबाग में मनाया जाने वाला ऐतिहासिक रामनवमी जुलूस अब केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं रह गया है, बल्कि यह आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक गर्व का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन चुका है। इस परंपरा की शुरुआत 1918 में हुई थी, जब गुरु सहाय ठाकुर ने अपने पांच साथियों के साथ इसका आयोजन किया था।

    समय के साथ, यह छोटा सा आयोजन एक विशाल जन आंदोलन में परिवर्तित हो गया है। इसके अनुशासन और भव्यता ने इसे देश-विदेश में एक विशेष पहचान दिलाई है। इस जुलूस की चर्चा भारत की संसद तक हो चुकी है, जो इसकी महत्ता को स्पष्ट करती है। कई विदेशी मेहमान भी इस जुलूस में हिस्सा ले चुके हैं।

    1970 में ताशा पार्टी का शामिल होना

    यह जुलूस स्वतंत्रता से पहले शुरू हुआ और 1947 के बाद इसका स्वरूप बदल गया। इसे राम जन्मोत्सव के साथ विजय उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। 1960 में महासमिति का गठन किया गया, जिसने इस आयोजन को व्यवस्थित और विस्तारित किया। 1970 में पहली बार ताशा पार्टी को इस जुलूस में शामिल किया गया, जो अब इस आयोजन की एक प्रमुख पहचान बन चुकी है। कोलकाता और पश्चिम बंगाल से ताशा वादक इसमें भाग लेने आते हैं।

    150 से अधिक अखाड़ों की भागीदारी

    इस भव्य आयोजन में वर्तमान में 150 से अधिक अखाड़े भाग लेते हैं, जिनमें लगभग 100 अखाड़े हजारीबाग शहर से होते हैं। जुलूस लगभग 10 किलोमीटर लंबे मार्ग पर—झंडा चौक, बड़ा अखाड़ा, महावीर स्थान, ग्वाल टोली होते हुए जामा मस्जिद रोड तक निकलता है।

    इस परंपरा की एक विशेषता यह है कि जबकि देशभर में रामनवमी का जुलूस नवमी को होता है, हजारीबाग में इसे दशमी को मनाया जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में 4 से 5 लाख श्रद्धालु शामिल होते हैं।

    लगभग 48 घंटे तक चलने वाला यह जुलूस ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से पूरे शहर को भक्तिमय माहौल में डुबो देता है। युवा पारंपरिक हथियारों और लाठी-डंडों के साथ करतब और शक्ति प्रदर्शन करते हैं, जो इस ऐतिहासिक जुलूस की विशिष्ट पहचान बन चुका है।

  • सरहुल में राजधानी रांची का झूमना, पाहन की भविष्यवाणी से बारिश की उम्मीद में वृद्धि

    सरहुल में राजधानी रांची का झूमना, पाहन की भविष्यवाणी से बारिश की उम्मीद में वृद्धि

    झारखंड में सरहुल पर्व का धूमधाम

    रांची: झारखंड के प्रमुख प्राकृतिक उत्सव सरहुल के अवसर पर राजधानी रांची पूरी तरह से उत्सव के रंगों में रंगी नजर आई। चारों ओर पारंपरिक वेशभूषा, मांदर की थाप और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के बीच के गहरे संबंधों की पहचान है।

    हातमा सरना स्थल पर विशेष पूजा

    सरहुल शोभा यात्रा की शुरुआत हातमा (सरना टोली) स्थित सरना स्थल से हुई, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विशेष पूजा की गई। मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने सरई (सखुआ) के पेड़ों के नीचे देवी-देवताओं का आह्वान किया। इस दौरान विभिन्न देवताओं को विशेष अर्पण किए गए, जिसमें इष्ट देवता के लिए सफेद मुर्गा, ग्राम देवता के लिए रंगवा मुर्गा, जल देवता के लिए लाल मुर्गा, पूर्वजों की स्मृति में रंगीली मुर्गा और बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए काली मुर्गी चढ़ाई गई। इसके साथ ही, चावल से बनी हड़िया (तपान) अर्पित कर सुख-शांति और संतुलन बनाए रखने की प्रार्थना की गई।

    पाहन की भविष्यवाणी: फसल की लहराने की खुशी

    सरहुल पर्व पर सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाहन की भविष्यवाणी होती है। इस वर्ष भी जगलाल पाहन ने किसानों के लिए अच्छी खबर दी। उन्होंने बताया कि पूजा में रखे गए घड़े का पानी पूरी तरह भरा हुआ पाया गया है। उनका मानना है कि यह संकेत है कि इस वर्ष अच्छी बारिश होगी, जिससे खेतों में धान की फसल लहलहाएगी और किसानों के भंडार भरे रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि बारिश शुभ दिशा से होगी, जो पूरे वर्ष के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जाता है।

    पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की उपस्थिति

    इस अवसर पर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन भी सरना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने सरना मां से राज्य की खुशहाली और लोगों की समृद्धि की कामना की। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड की पहचान उसकी संस्कृति से है और इसे हमेशा संजोकर रखना चाहिए।

    खिचड़ी प्रसाद और पारंपरिक नृत्य का आयोजन

    पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच खिचड़ी का महाप्रसाद बांटा गया। इसके बाद सरना टोली से शोभा यात्रा निकली, जिसमें लोग मांदर, नगाड़ा और ढाक की थाप पर नाचते नजर आए। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते आगे बढ़ते रहे। पूरे माहौल में उत्साह, आस्था और अपनापन साफ झलक रहा था।

    सरहुल: प्रकृति से जुड़ने का पर्व

    सरहुल केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि मानव और प्रकृति का रिश्ता कितना गहरा है। पेड़-पौधों, जल और धरती के प्रति सम्मान जताने वाला यह पर्व झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।