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    झाड़ियों में फेंकी गई नवजात बच्ची, जाने इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना…

    चाईबासा | 25 जुलाई 2025:
    झारखंड के चाईबासा जिले में इंसानियत को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। चक्रधरपुर प्रखंड के कियापता गांव में शनिवार सुबह ग्रामीणों को झाड़ियों के बीच एक नवजात बच्ची लावारिस हालत में मिली। बच्ची जन्म के कुछ घंटे बाद ही बिना कपड़ों के झाड़ियों में फेंकी गई थी, जहां वह जोर-जोर से रो रही थी।


    झाड़ियों से आई चीख, जिसने सबको झकझोर दिया

    सुबह-सुबह जब कुछ ग्रामीण शौच के लिए बाहर निकले, तो उन्हें पास की झाड़ियों से किसी बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। पहले तो उन्होंने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन जब रोने की आवाज लगातार आने लगी, तो वे पास पहुंचे और आंखों के सामने का दृश्य देख स्तब्ध रह गए

    झाड़ियों के बीच एक नवजात बच्ची, जो शायद कुछ घंटे पहले ही जन्मी थी, बिना किसी कपड़े के पड़ी थी।


    समाजसेवी ने निभाई फरिश्ते की भूमिका

    घटना की जानकारी मिलते ही ग्रामीणों ने सक्रिय समाजसेवी सिकंदर जामुदा को सूचित किया।
    सिकंदर जामुदा तुरंत मौके पर पहुंचे और बच्ची को अपने संरक्षण में लिया। प्राथमिक जांच में यह पता चला कि बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है और हाल ही में उसका जन्म हुआ है।

    ग्रामीणों का मानना है कि यह नाजायज संतान हो सकती है, जिससे छुटकारा पाने के लिए बेरहमी से उसे मरने के लिए छोड़ दिया गया।


    “कौन कर सकता है इतना निर्दयी काम?” – सिकंदर जामुदा

    बच्ची को बचाने वाले सिकंदर जामुदा ने कहा:

    “कोई मां-बाप कैसे अपने ही मासूम को इस हाल में छोड़ सकते हैं? यह सोचकर भी मन कांप उठता है। समाज में ऐसी घटनाएं केवल मानवता को शर्मसार नहीं करतीं, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे की विफलता भी उजागर करती हैं।”

    फिलहाल बच्ची को उनके घर पर सुरक्षित रखा गया है, और उनकी देखरेख में उसकी पूरी तरह से देखभाल की जा रही है।


    प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग

    सिकंदर जामुदा ने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले की गंभीरता से जांच की जाए और दोषियों को सख्त सजा दी जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की निर्ममता दोहराई न जा सके। गांव के लोग भी इस घटना से व्यथित हैं और बच्ची की सुरक्षा के साथ-साथ न्याय की मांग कर रहे हैं।

    चाईबासा की यह घटना न केवल समाज को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है, बल्कि नवजात बेटियों के प्रति दृष्टिकोण पर भी गंभीर सवाल उठाती है। शुक्र है कि कुछ संवेदनशील नागरिकों और समाजसेवियों के चलते एक मासूम की जान बच गई। लेकिन यह सिस्टम और सोच दोनों को बदलने का वक्त है।