झारखंड में सरहुल पर्व का धूमधाम
रांची: झारखंड के प्रमुख प्राकृतिक उत्सव सरहुल के अवसर पर राजधानी रांची पूरी तरह से उत्सव के रंगों में रंगी नजर आई। चारों ओर पारंपरिक वेशभूषा, मांदर की थाप और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के बीच के गहरे संबंधों की पहचान है।
हातमा सरना स्थल पर विशेष पूजा
सरहुल शोभा यात्रा की शुरुआत हातमा (सरना टोली) स्थित सरना स्थल से हुई, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विशेष पूजा की गई। मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने सरई (सखुआ) के पेड़ों के नीचे देवी-देवताओं का आह्वान किया। इस दौरान विभिन्न देवताओं को विशेष अर्पण किए गए, जिसमें इष्ट देवता के लिए सफेद मुर्गा, ग्राम देवता के लिए रंगवा मुर्गा, जल देवता के लिए लाल मुर्गा, पूर्वजों की स्मृति में रंगीली मुर्गा और बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए काली मुर्गी चढ़ाई गई। इसके साथ ही, चावल से बनी हड़िया (तपान) अर्पित कर सुख-शांति और संतुलन बनाए रखने की प्रार्थना की गई।
पाहन की भविष्यवाणी: फसल की लहराने की खुशी
सरहुल पर्व पर सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाहन की भविष्यवाणी होती है। इस वर्ष भी जगलाल पाहन ने किसानों के लिए अच्छी खबर दी। उन्होंने बताया कि पूजा में रखे गए घड़े का पानी पूरी तरह भरा हुआ पाया गया है। उनका मानना है कि यह संकेत है कि इस वर्ष अच्छी बारिश होगी, जिससे खेतों में धान की फसल लहलहाएगी और किसानों के भंडार भरे रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि बारिश शुभ दिशा से होगी, जो पूरे वर्ष के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जाता है।
पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की उपस्थिति
इस अवसर पर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन भी सरना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने सरना मां से राज्य की खुशहाली और लोगों की समृद्धि की कामना की। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड की पहचान उसकी संस्कृति से है और इसे हमेशा संजोकर रखना चाहिए।
खिचड़ी प्रसाद और पारंपरिक नृत्य का आयोजन
पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच खिचड़ी का महाप्रसाद बांटा गया। इसके बाद सरना टोली से शोभा यात्रा निकली, जिसमें लोग मांदर, नगाड़ा और ढाक की थाप पर नाचते नजर आए। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते आगे बढ़ते रहे। पूरे माहौल में उत्साह, आस्था और अपनापन साफ झलक रहा था।
सरहुल: प्रकृति से जुड़ने का पर्व
सरहुल केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि मानव और प्रकृति का रिश्ता कितना गहरा है। पेड़-पौधों, जल और धरती के प्रति सम्मान जताने वाला यह पर्व झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।
