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  • सुप्रीम कोर्ट ने 25 जनहित याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया, CJI सूर्यकांत का बयान

    सुप्रीम कोर्ट ने 25 जनहित याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया, CJI सूर्यकांत का बयान

    सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिकाओं पर अधिवक्ता को दी कड़ी नसीहत

    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 25 अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर करने वाले एक वकील को सख्त चेतावनी दी है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत में आने से पहले संबंधित प्राधिकरणों से संपर्क करना आवश्यक है और वकील को अपने पेशे पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

    याचिकाओं का वापस लेना

    सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के रूप में उपस्थित अधिवक्ता सचिन गुप्ता ने कहा कि वे अपनी सभी जनहित याचिकाएं वापस लेना चाहते हैं। इस पर सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सलाह दी कि उन्हें पहले विभिन्न मुद्दों पर संबंधित अधिकारियों को सूचित करना चाहिए और आवश्यक होने पर ही अदालत का रुख करना चाहिए।

    विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता

    पीठ ने बताया कि बार के सदस्य के रूप में याचिकाकर्ता को एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और पहले संबंधित संस्थाओं को कार्यवाही का अवसर देना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि उचित समय पर आवश्यकता पड़े, तो वे इन मुद्दों पर विचार करने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने सभी 25 जनहित याचिकाओं को वापस लेने की अनुमति प्रदान की।

    जनहित याचिकाओं में उठाए गए मुद्दे

    इन जनहित याचिकाओं में कई महत्वपूर्ण विषयों पर निर्देश देने की मांग की गई थी। इनमें एक सामान्य संपर्क भाषा नीति बनाने, कानूनी जागरूकता बढ़ाने के लिए टीवी कार्यक्रम शुरू करने, साबुन में उपयोग होने वाले रसायनों के लिए दिशा-निर्देश तय करने और भिखारियों तथा ट्रांसजेंडर समुदाय के उत्थान के लिए नीति बनाने के सुझाव शामिल थे।

    अधिवक्ता की पूर्व याचिकाओं का निपटारा

    इससे पहले, 9 मार्च को अदालत ने गुप्ता की पांच याचिकाओं को “निरर्थक” बताते हुए खारिज कर दिया था। इनमें से एक याचिका में यह जांच की मांग की गई थी कि क्या प्याज और लहसुन में ‘तामसिक’ ऊर्जा होती है। इस पर नाराजगी जताते हुए सीजेआई ने टिप्पणी की थी कि “आधी रात को ये सब याचिकाएं तैयार करते हो क्या?” अदालत ने उन याचिकाओं को अस्पष्ट और आधारहीन करार दिया था।

  • मंदिर से बहिष्कार समाज को बांटेगा, हिंदू धर्म पर प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी

    मंदिर से बहिष्कार समाज को बांटेगा, हिंदू धर्म पर प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: मंदिरों में प्रवेश का अधिकार

    नई दिल्ली। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों और मठों में प्रवेश को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी विशेष वर्ग को बाहर रखने से समाज में विभाजन हो सकता है, जो हिंदू धर्म पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति को सभी मंदिरों और मठों में जाने का अधिकार होना चाहिए।

    संविधान पीठ की सुनवाई

    यह टिप्पणी नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा शबरिमला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान की गई। पीठ धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और इसके विस्तार पर भी विचार कर रही है।

    संविधान पीठ के न्यायाधीश

    संविधान पीठ की अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं, जिनके साथ न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

    न्यायालय की टिप्पणियाँ

    सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि परंपरा के नाम पर किसी वर्ग को मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो इससे हिंदू धर्म पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति का मंदिर और मठ में प्रवेश का अधिकार होना चाहिए। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने सहमति जताते हुए कहा कि इस प्रकार का निष्कासन समाज को बांट देगा।

    संगठनों की दलीलें

    इस सुनवाई के दौरान, नायर सर्विस सोसाइटी, अयप्पा सेवा समाजम, और क्षेत्र संरक्षण समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन ने तर्क प्रस्तुत किया कि कुछ मंदिर विशेष वर्गों तक सीमित हो सकते हैं।

    वेंकटरमण देवरू मामले का उल्लेख

    अदालत ने वेंकटरमण देवरू मामले का हवाला देते हुए कहा कि मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगाने की परंपरा का व्यापक प्रभाव धर्म पर पड़ सकता है।

    शबरिमला विवाद का इतिहास

    2018 में, सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंध को हटा दिया था। इसके बाद, 2019 में इस मुद्दे को व्यापक विचार के लिए बड़ी पीठ को भेज दिया गया। वर्तमान में, अदालत धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित सात प्रमुख सवालों पर विचार कर रही है और सुनवाई जारी है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची विवाद पर टीएमसी की आपत्ति पर कहा ‘यह हर बार होता है’

    सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची विवाद पर टीएमसी की आपत्ति पर कहा ‘यह हर बार होता है’

    कोलकाता पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर उठे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि एक साथ बड़ी संख्या में फॉर्म-6 का जमा होना कोई असामान्य घटना नहीं है, यह प्रक्रिया पहले भी देखी गई है। अदालत ने यह भी बताया कि यदि किसी नाम पर आपत्ति है, तो चुनाव आयोग के पास शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

    फॉर्म-6 को लेकर TMC की आपत्ति

    तृणमूल कांग्रेस के वकील कल्याण बनर्जी ने यह तर्क रखा कि एक ही व्यक्ति ने 30 हजार फॉर्म-6 जमा किए हैं। फॉर्म-6 का उपयोग मतदाता सूची में नाम जोड़ने या संसदीय क्षेत्र में परिवर्तन के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि पूरक सूची आने के बाद भी नए फॉर्म स्वीकार हो रहे हैं, जिससे प्रक्रिया पर संदेह उत्पन्न होता है।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: यह पहली बार नहीं

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि “ऐसा हर बार होता है, इसमें कुछ असामान्य नहीं है।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी नए नाम पर आपत्ति दर्ज करने का विकल्प उपलब्ध है और संबंधित पक्ष चुनाव आयोग से संपर्क कर सकते हैं।

    चुनाव आयोग का पक्ष

    भारत निर्वाचन आयोग के वकील ने कहा कि नियमों के अनुसार उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तिथि तक मतदाताओं के नाम जोड़े जा सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति हाल ही में 18 वर्ष का हुआ है, तो उसे मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का अधिकार है।

    अदालत का प्रक्रिया को समझने की सलाह

    सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि इस मुद्दे पर जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा और पूरी प्रक्रिया को समझना आवश्यक है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया कि चुनाव उसी सूची के आधार पर होते हैं, जो निर्धारित तिथि तक अपडेट की जाती है।

    अदालत ने संकेत दिया कि सभी आपत्तियों पर निर्णय 7 अप्रैल तक लिया जाएगा।

  • सुप्रीम कोर्ट 19 जनवरी को ‘जन नायगन’ के निर्माता की याचिका पर करेगा सुनवाई

    सुप्रीम कोर्ट 19 जनवरी को ‘जन नायगन’ के निर्माता की याचिका पर करेगा सुनवाई

    मुंबई: थलापति विजय की फिल्म **जन नायगन** इन दिनों सेंसर सर्टिफिकेट को लेकर गंभीर कानूनी विवाद का सामना कर रही है। यह फिल्म विजय की अंतिम फिल्म मानी जा रही है, क्योंकि वे राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं। उनकी पार्टी, **तमिलगा वेट्री कझगम**, की शुरुआत के बाद यह उनकी आखिरी बड़ी स्क्रीन उपस्थिति होगी। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के द्वारा सर्टिफिकेट में देरी और कोर्ट के मामले के चलते फिल्म की रिलीज में असमंजस है।

    <h3 style="text-align: justify;"><strong>सुप्रीम कोर्ट 19 जनवरी को सुनवाई करेगा 'जन नायगन' के प्रोड्यूसर की याचिका पर</strong></h3>
    
    <p style="text-align: justify;">फिल्म को पहले 9 जनवरी 2026 को **पोंगल** के अवसर पर रिलीज करने की योजना थी। लेकिन CBFC ने इसे रिव्यू कमिटी के पास भेज दिया, जिसके खिलाफ प्रोडक्शन हाउस **KVN प्रोडक्शंस** ने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 9 जनवरी को एकल जज बेंच ने CBFC को तुरंत U/A 16+ सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया, जिससे प्रोड्यूसर में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन कुछ ही घंटों बाद, हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस आदेश पर अंतरिम स्थगन लगा दिया।</p>
    
    <p style="text-align: justify;">कोर्ट ने कहा कि एकल जज ने CBFC को अपना जवाब दाखिल करने का पर्याप्त समय नहीं दिया, जिससे फिल्म की रिलीज फिर से अनिश्चित हो गई। CBFC का कहना है कि फिल्म में कुछ संवेदनशील मुद्दे हैं, इसलिए रिव्यू होना आवश्यक है। इस स्थगन के खिलाफ KVN प्रोडक्शंस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। सुप्रीम कोर्ट की कॉज लिस्ट के अनुसार, इस मामले की सुनवाई 19 जनवरी 2026 को होने वाली है।</p>
    
    <p style="text-align: justify;">फिल्म पर लगभग 500 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है और प्रोड्यूसर थलापति विजय को उनके 30 साल के करियर का सही विदाई देना चाहते हैं। यह फिल्म **एच. विनोथ** द्वारा निर्देशित है और इसमें **पूजा हेगड़े**, **ममिता बाइजू** जैसे कलाकार शामिल हैं। यह एक राजनीतिक एक्शन थ्रिलर है, जिसमें सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। फिल्म का ट्रेलर जब रिलीज हुआ था तो इसे दर्शकों ने काफी पसंद किया था, लेकिन अब रिलीज डेट अनिश्चित है। </p>
    
    <p style="text-align: justify;">कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि केरल में 14 जनवरी को रिलीज की कोशिश की गई थी, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण ऐसा नहीं हो सका। यह मामला तमिल सिनेमा और राजनीति में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना हुआ है। कई नेता और सेलिब्रिटी CBFC पर सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि, विजय ने अभी तक इस पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है। फैंस उम्मीद कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट शीघ्र ही फैसला देगा ताकि उनकी पसंदीदा फिल्म theaters में प्रदर्शित हो सके। फिलहाल 19 जनवरी का इंतजार है। अगर सुप्रीम कोर्ट स्थगन हटाता है तो फिल्म जल्दी रिलीज हो सकती है, अन्यथा देरी और बढ़ सकती है।</p>
  • Netflix-YouTube जैसे OTT प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री के लिए अब Aadhaar प्रमाणन अनिवार्य

    Netflix-YouTube जैसे OTT प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री के लिए अब Aadhaar प्रमाणन अनिवार्य

    OTT कंटेंट के लिए आधार वेरिफिकेशन: भारत के उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि ऑनलाइन सामग्री देखने के लिए उपयोगकर्ताओं को अपनी उम्र की पुष्टि आधार या पैन कार्ड के माध्यम से करनी हो सकती है। यह उपाय उन सामग्रियों पर लागू होगा, जिन्हें ‘अश्लील’, दिव्यांग व्यक्तियों के लिए ‘आपत्तिजनक’ या ‘राष्ट्र-विरोधी’ माना जाएगा। यह जानकारी जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच द्वारा डिजिटल कंटेंट नियमों पर चल रही सुनवाई के दौरान पेश की गई थी।

    यह नवीनतम अपडेट सर्वोच्च न्यायालय के एक सुझाव से संबंधित है, जिसे अभी सरकारी नियमों में शामिल नहीं किया गया है। यह सुझाव 27 नवंबर, 2025 को हुई सुनवाई में सामने आया था।

    विवरण क्या है?

    विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब लोकप्रिय यूट्यूबर रणवीर अल्लाहबादिया, सायम रैना और कुछ अन्य प्रस्तुतकर्ताओं के खिलाफ ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ शो के एक एपिसोड में अश्लील टिप्पणियों के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई। इस शो में कुछ ऐसे चुटकुले और संवाद थे, जो विकलांगों और संवेदनशील मुद्दों पर अनुचित समझे गए। इसी वजह से यह मामला उभरा।

    इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमल्या बागची की बेंच द्वारा की जा रही थी। सुनवाई में, बेंच ने चिंता जाहिर की कि यूट्यूब, नेटफ्लिक्स और अन्य OTT प्लेटफार्मों पर उपलब्ध यूजर-जनरेटेड कंटेंट के लिए मौजूदा नियम पर्याप्त नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर अश्लील या हानिकारक सामग्री की उपलब्धता नाबालिगों के मानसिक स्वास्थ्य और समाज की नैतिकता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

    एडल्ट कंटेंट को रोकने के लिए आधार वेरिफिकेशन का सुझाव

    ऑनलाइन अश्लील सामग्री को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि किताबों या पेंटिंग में अश्लीलता अलग होती है, जहां नीलामी होने पर रोक लगाई जा सकती है। लेकिन मोबाइल फोन पर, यह स्थिति भिन्न है, क्योंकि एक बार फ़ोन ऑन करने पर सामग्री तुरंत सामने आ जाती है।

    CJI सूर्यकांत ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जबकि प्लेटफॉर्म चेतावनी प्रदर्शित करते हैं, वह केवल कुछ सेकंड के लिए होती है और उसके बाद शो तुरंत शुरू हो जाता है। इसलिए आधार वेरिफिकेशन का विकल्प उपयुक्त हो सकता है, जो दर्शकों की उम्र की पहचान कर सके। इसे एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में प्रारंभ किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक सुझाव है और कोई अनिवार्य आदेश नहीं है।

  • पूर्व डीसी छवि रंजन 17 महीने बाद जेल से निकले

    पूर्व डीसी छवि रंजन 17 महीने बाद जेल से निकले

    📌 गांडीव लाइव डेस्क:

    छवि रंजन को मिली जमानत: 17 महीने बाद रिहाई 🏛️

    रांची के पूर्व उपायुक्त छवि रंजन को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है। उन्हें बरियातू जमीन घोटाले के मामले में 17 महीने तक जेल में बिताने के बाद रिहा किया गया है।2023 में गिरफ्तार छवि रंजन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। उनकी गिरफ्तारी ने पूरे राज्य में हलचल मचाई थी। उनके वकीलों ने दलील दी थी कि रंजन के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है और उन्हें निराधार आरोपों में बंद रखा गया था।

    सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 🚨

    सुप्रीम कोर्ट ने उचित सुनवाई के बाद रंजन की जमानत को मंजूरी देते हुए कहा कि उनके खिलाफ मौजूद साक्ष्य की समीक्षा की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि लंबी हिरासत से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।छवि रंजन की रिहाई से राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा हो गई है।रंजन का कहना है कि वे कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हैं और न्यायालय के निर्णय का पालन करेंगे।

    भविष्य की संभावनाएं

    अब यह देखना है कि रंजन अपने खिलाफ चल रहे मामले में अपनी कानूनी लड़ाई किस तरह आगे बढ़ाते हैं। इस समय, उनकी रिहाई से कई मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, जिनमें प्रशासनिक सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने के विषय शामिल हैं।

  • जस्टिस बीआर गवई होंगे सुप्रीम कोर्ट के अगले चीफ जस्टिस, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दी मंजूरी

    जस्टिस बीआर गवई होंगे सुप्रीम कोर्ट के अगले चीफ जस्टिस, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दी मंजूरी

    justice BR Gavai Next CJI: न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई को मंगलवार को भारत का अगला प्रधान न्यायाधीश (CJI) नियुक्त किया गया है. जस्टिस गवई 14 मई को सीजेआई का पदभार संभालेंगे. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसकी मंजूरी दे दी है.

  • Supreme Court ने यूपी के टॉप अधिकारियों को जेल से किया रिहा

    Supreme Court ने यूपी के टॉप अधिकारियों को जेल से किया रिहा

    हाईकोर्ट के इन निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अधिकारियों को राहत देते हुए उन्हें हिरासत से रिहा करने का निर्देश दिया।

    सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के वित्त विभाग के टॉप अधिकारियों को राहत देते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों पर स्टे लगा दिया है, जिसके तहत अधिकारियों को गिरफ्तार करने के निर्देश दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर शुक्रवार को सुनवाई करेगा। 

    क्या है मामला

    इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें प्रस्ताव दिया गया था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों की सुविधाओं में बढ़ोतरी की जाए। प्रस्ताव में रिटायर्ड जजों को घर के कामकाज के लिए घरेलू सहायक देने की मांग की गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार अप्रैल को अधिकारियों को निर्देश जारी किए थे। हालांकि हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इस पर हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की गई, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश के वित्त सचिव एस एम ए रिजवी और विशेष सचिव (वित्त) सरयू प्रसाद मिश्रा पर कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करने के लिए दोनों अधिकारियों को हिरासत में लेने का निर्देश दिया था। 

    हाईकोर्ट के इन निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अधिकारियों को राहत देते हुए उन्हें हिरासत से रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट अब शुक्रवार को इस मामले पर आगे सुनवाई करेगा। 

    अब्दुल्ला आजम की याचिका पर होगी सुनवाई
    विरोध प्रदर्शन मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में अब्दुल्ला आजम ने मांग की है इलाहाबाद होईकोर्ट द्वारा धरना प्रदर्शन मामले में उन्हें दोषी ठहराए जाने पर रोक लगे। अब सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को इस मामले पर सुनवाई करेगा। बता दें कि 29 जनवरी 2008 को मुरादाबाद के छजलैट में पुलिस चेकिंग के दौरान जब पुलिस ने सपा नेता अब्दुला आजम की कार को चेकिंग के लिए रोका तो अब्दुल्ला आजम वहीं धरने पर बैठ गए थे। इस पर पुलिस ने अब्दुल्ला आजम और कई अन्य सपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब्दुल्ला आजम को दोषी ठहराया है और दो साल की सजा सुनाई है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने राशन कार्ड उपलब्ध कराने की समय सीमा तीन महीने बढ़ाई
    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा प्रवासी मजदूरों को राशन कार्ड उपलब्ध कराने की समय सीमा तीन महीने और बढ़ा दी है। बता दें कि केंद्रीय श्रम मंत्रालय के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत मजदूरों को यह लाभ मिलेगा। जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने यह आदेश दिया है। इस आदेश के बाद प्रवासी मजदूर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन आदि की सुविधा ले सकेंगे।  

    अंजलानी भारद्वाज, हर्ष मंदेर और जगदीप छोकर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर प्रवासी मजदूरों को राशन कार्ड देने की मांग की थी। जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह फैसला दिया। याचिका में कहा गया कि ऐसा नहीं हैं कि हम कह रहे हैं कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में असमर्थ रही है लेकिन अभी भी कुछ लापरवाही है और कई लोग अभी भी छूट गए हैं, ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को देखना चाहिए कि सभी को राशन कार्ड मिले। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक पुराने आदेश में कहा था कि सरकार प्रवासी मजदूरों को राशन कार्ड देने से मना नहीं कर सकती। 

  • पीएम मोदी पर BBC की डॉक्यूमेंट्री पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई

    पीएम मोदी पर BBC की डॉक्यूमेंट्री पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई

    याचिकाकर्ता ने BBC की डॉक्यूमेंट्री पर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से 21 जनवरी, 2023 को जारी आदेश को मनमाना, दुर्भाग्यपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने का निर्देश देने की मांग की है. 

    नई दिल्‍ली: बीबीसी की डॉक्‍यूमेंटी पर पाबंदी लगाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट में बीबीसी (BBC) की  डॉक्यूमेंट्री पर पाबंदी लगाने के खिलाफ याचिका दायर की गई हैं. वकील मनोहर लाल शर्मा द्वारा दायर की गई इस याचिका में डॉक्‍यूमेंट्री पर पाबंदी लगाने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट 6 फरवरी को इस मामले पर सुनवाई करेगा.

    याचिकाकर्ता वकील एमएल शर्मा ने जल्द सुनवाई की मांग की थी, लेकिन सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि 6 फरवरी को सुनवाई होगी. इस याचिका में वर्ष 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों और उसके पहले बाद बनी परिस्थितियों पर बीबीसी की बनाई दो भागों वाली इस विवादास्पद डॉक्यूमेंट्री ‘इण्डिया: द मोदी क्वेश्चन’ पर कथित पाबंदी लगाने के केंद्र सरकार के आदेश को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता ने इस डॉक्यूमेंट्री पर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से 21 जनवरी, 2023 को जारी आदेश को मनमाना, दुर्भाग्यपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने का निर्देश देने की मांग की है. 

    याचिका में कोर्ट से गुहार लगाई गई है कि देशभर में विवाद की जड़ बनी बीबीसी की इस डॉक्यूमेंट्री के दोनों पार्ट, कोर्ट में मंगाकर उनमें मौजूद सामग्री की तथ्य आधारित गहन जांच पड़ताल हो. इसके बाद कोर्ट उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दे, जो 2002 के गुजरात दंगों के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जिम्मेदार थे.

    कोर्ट यह तय कर दे कि क्या देश के नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (2) के तहत दिए गए अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत 2002 के गुजरात दंगों पर समाचार, तथ्य और रिपोर्ट देखने का अधिकार है? क्या केंद्र सरकार प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार पर अंकुश लगा सकती है? क्या राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 352 का प्रयोग करते हुए आपातकाल घोषित किए बिना, केंद्र सरकार द्वारा आपातकालीन प्रावधानों को लागू कर सकते हैं? अर्जी में दावा किया गया है कि बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री में ऐसे रिकॉर्डेड तथ्य और सबूत हैं, जिनका उपयोग पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए किया जा सकता है.

  • आज सुप्रीम कोर्ट में होगी हल्द्वानी मामले की सुनवाई

    आज सुप्रीम कोर्ट में होगी हल्द्वानी मामले की सुनवाई

    एक और शाहीनबाग…

    गफूर बस्ती के 5000 लोगों का भाग्य आज होगा तय

    गांडीव स्पेशल

    दिल्ली। उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण कर बसा गफूर बस्ती का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बस्ती के प्रभावित 5000 परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर बस्ती को उजाड़ने से बचाने की गुहार लगाई है। इस याचिका पर आज गुरुवार को सुनवाई होनी है, जिसमें इन 5000 परिवारों के भाग्य का फैसला होना है।

    उत्तराखंड हाइकोर्ट के फैसले पर उजाड़ी जा रही है बस्ती

    ज्ञात हो कि उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे की 29 एकड़ जमीन पर वर्षों से अतिक्रमण कर हजारों लोग रह रहे हैं। रेलवे की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाल ही में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने फैसला दिया था कि अवैध अतिक्रमण को हटाया जाए।

    इस ठंड में मैं कहां जाऊंगी ?
    सड़कों पर बिलख रहे हैं लोग।

    शाहीनबाग की तरह हो रहा है जोरदार विरोध प्रदर्शन

    दिल्ली में शाहीनबाग बस्ती को उजाड़े जाने के विरोध में लंबे समय तक एक धर्म विशेष के लोगों ने जिस तरह से प्रदर्शन किया था, धरना दिया था, वही हालात वर्तमान में हल्द्वानी के गफूर बस्ती में दिख रहा है। एक वर्ग विशेष के लोग प्रशासन की इस कार्रवाई के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं। जोरदार प्रदर्शन हो रहा है। अब सारा मामला सुप्रीम कोर्ट में आज होने वाली सुनवाई पर टिका हुआ है।

    विरोध प्रदर्शन में बच्चे भी है शामिल।
    कैंडल मार्च निकालकर कर रहे हैं विरोध।
    शाहीन बाग की तरह धरने पर बैठी है महिलाएं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाई कोर्ट को फटकारा

    पूछा- जिनके पास पैसे नहीं, क्या उन्हें नहीं मिलेगी जमानत

    बड़ी रकम जमा कर आरोपी को जमानत देने के हाईकोर्ट के फैसले पर लताड़ा

    कोर्ट ने कहा कि जज ने किस आधार पर जमानत का फैसला किया, यह हमारे समझ से परे

    ऐसे सभी मामलों में जमानत को लेकर फिर से सुनवाई का निर्देश

    दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि आरोपी के पैसे जमा करने की क्षमता से जमानत नहीं तय की जा सकती है। जमानत को लेकर झारखंड हाई कोर्ट के एक जज के फैसलों पर सवाल उठाते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि जमानत का फैसला अपराध की प्रकृति के आधार पर होता है न कि आरोपी की इस क्षमता पर कि वह कितना पैसा जमा करा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत से जुड़े इस तरह के फैसलों पर हाई कोर्ट को फिर से नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि जज ने जमानत देने की जो प्रक्रिया अपनाई है वह सही नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को जमानत पर फैसला इस आधार पर लेना होता है कि अपराध किस तरह का है, उसकी गंभीरता क्या है, न कि आरोपी की पैसे देने की क्षमता से। झारखंड हाई कोर्ट को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी की।
    दरअसल, झारखंड हाई कोर्ट ने कई आरोपियों को इस शर्त पर जमानत दे दी कि वे अच्छी-खासी रकम जमा कर दे, जबकि अपराध की प्रकृति पर ध्यान नहीं दिया गया। उन्हें पीड़ित को अंतरिम मुआवजा के रूप में बड़ी रकम जमा करने को कहा गया।
    सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाई कोर्ट के कई ऐसे फैसलों को देखा और कहा कि अदालत के एक सिंगल जज ने जो प्रक्रिया अपनाई है, वह कानून के मुताबिक सही नहीं है। ऐसे ही एक आदेश में हाई कोर्ट ने एक शख्स और उसके मां-बाप को घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामले में प्री-अरेस्ट बेल यानी अग्रिम जमानत दे दी थी। इसके लिए कोर्ट ने 25 हजार रुपये का बॉन्ड भरने और पीड़ित को अंतरिम मुआवजे के तौर पर साढ़े 7 लाख रुपये देने की शर्त रखी। खास बात ये है कि पीड़ित पत्नी के मुताबिक, उसके परिवार ने ससुराल वालों को साढ़े 7 लाख रुपये का दहेज दिया था।

    अग्रिम जमानत की याचिका पैसों की रिकवरी वाली प्रक्रिया नहीं


    आरोपियों की याचिका को सुनवाई के लिए मंजूर करते हुए जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जमानत की शर्तों को रद्द कर दिया। बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट ने जो प्रक्रिया अपनाई, वह कानून के मुताबिक नहीं है।
    बेंच ने कहा कि गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत की याचिका पैसों की रिकवरी वाली प्रक्रिया नहीं है। अगर किसी शख्स को अपनी गिरफ्तारी की आशंका है तो उसे प्री-अरेस्ट बेल के लिए पैसे जमा करना हो, इसका कोई औचित्य नहीं है
    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने दहेज से लेकर धोखाधड़ी, रेप और पॉक्सो ऐक्ट जैसे अलग-अलग मामलों में भी आरोपियों को इसी तरह से जमानत दी है।
    कोर्ट ने कहा कि इन सभी मामलों में एक चीज कॉमन है। एक ही जज ने अपराध की प्रकृति के हिसाब से जमानत की जरूरतों पर सही से विचार किए बिना ही बड़ी रकम जमा करने की शर्त पर जमानतें दी। अगर कोई शख्स बड़ी रकम नहीं जमा कर सकता, उसके पास पैसे नहीं हों तो उन्हें जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यही होता दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जज ने किस आधार पर जमानत का फैसला किया, यह हमारे समझ से परे है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट को इस तरह के सभी मामलों में जमानत को लेकर फिर से सुनवाई का निर्देश दिया।