रांची: जीवन में मां का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। मां के बिना जीवन अधूरा लगता है। लेकिन, हमारे आसपास कुछ ऐसी मांएं भी हैं, जो अपने बच्चों की देखभाल के साथ-साथ मरीजों की सेवा भी कर रही हैं। हम बात कर रहे हैं सदर अस्पताल में कार्यरत जीएनएम नर्सों, आभा टोप्पो और एलिजाबेथ कुजूर की, जो एक साथ दो-दो मां का कर्तव्य निभा रही हैं। बावजूद इसके, उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन वे अपनी ड्यूटी को पूरी निष्ठा से निभा रही हैं।
नाइट शिफ्ट में ही मिली ड्यूटी
आभा टोप्पो सदर अस्पताल में जीएनएम के पद पर कार्यरत हैं। उनकी ड्यूटी तीनों शिफ्टों में होती है। उन्होंने बताया कि बेटी के जन्म के बाद उन्हें छह महीने की मैटरनिटी लीव मिली थी, जिससे कोई समस्या नहीं हुई। लेकिन, इसके बाद बेटी को घर पर छोड़कर काम पर आना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि घर में उसे देखने वाला कोई नहीं था। उनके पति अपनी ड्यूटी पर थे, जिससे ड्यूटी के समय बेटी को लेकर मरीजों की देखभाल करना कठिन हो गया। अस्पताल प्रबंधन ने भी इस पर चिंता जताई कि बच्चे के साथ मरीजों की देखभाल ठीक से नहीं हो पाती।
जेनरल शिफ्ट के बाद उन्हें नाइट शिफ्ट में ड्यूटी मिली। इस दौरान उन्होंने कुछ दिनों के लिए एक केयर टेकर भी रखा, लेकिन फिर भी बच्ची की देखभाल ठीक से नहीं हो पा रही थी। उन्होंने पड़ोसी के पास भी कुछ दिनों के लिए बच्ची को छोड़कर काम किया। हालांकि, धीरे-धीरे उन्होंने काम के साथ बच्ची को लाना सीख लिया। अब वे अपनी बेटी को साथ लेकर आती हैं और सहयोगी नर्स उसकी देखभाल करती हैं, जिससे वे मरीजों का सही से ध्यान रख पाती हैं। नाइट ड्यूटी में थोड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि इस समय अस्पताल में कोई बच्ची को नहीं देखता, लेकिन वे इसे भी अपने कर्तव्य का हिस्सा मानती हैं।
काम के साथ बच्चे की देखभाल भी जरूरी
एलिजाबेथ कुजूर भी सदर अस्पताल में जीएनएम हैं। उनकी ड्यूटी भी सुबह, दोपहर और रात की शिफ्ट में होती है। 11 महीने की बेटी को घर पर छोड़कर आना उनके लिए कठिन होता है। लेकिन, उन्होंने ममता को खुद से अलग नहीं किया और ड्यूटी में भी रुकावट नहीं आने दी। वे दोनों कामों को संतुलित कर मरीजों की सेवा कर रही हैं और अपने बच्चे की परवरिश भी कर रही हैं। एलिजाबेथ ने बताया कि बच्ची 11 महीने की है और शुरुआत में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बच्ची को साथ लेकर ड्यूटी पर आना शुरू किया।
रेस्ट रूम में बच्ची को छोड़कर वे मरीजों की सेवा करती रहीं। नाइट ड्यूटी के स्टाफ ने भी उनका सहयोग किया, जिससे काम और बच्चे की देखभाल में ज्यादा परेशानी नहीं हुई। उनके सहयोगी दिन में भी बच्ची का ध्यान रखते हैं और उसे खाना खिलाते हैं। इससे बच्ची भी सभी के साथ रह जाती है। उन्होंने कहा कि काम करने के साथ-साथ बच्चे की देखभाल करना भी आवश्यक है, और इसमें घर का समर्थन भी महत्वपूर्ण है। वे अस्पताल में दूसरी मां के रूप में मरीजों की देखभाल को भी अपनी जिम्मेदारी मानती हैं।