पुण्यतिथि विशेष: मांझी बाबा से मंत्री बनने तक, रामदास सोरेन की अनोखी यात्रा, झारखंड की स्मृति में।

झारखंड में रामदास सोरेन की पुण्यतिथि पर यादें ताजा

4 अगस्त 2025 को गुरुजी के निधन के बाद झारखंड अभी शोक से उबरा भी नहीं था कि तात्कालीन स्कूली शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन का असामयिक निधन प्रदेश को एक बार फिर शोक में डुबो गया। अगस्त का महीना झारखंड मुक्ति मोर्चा के लिए अत्यंत कठिन साबित हुआ है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए यह समय भावनात्मक दृष्टि से भी बेहद चुनौतीपूर्ण रहा, जो उनके आंसुओं से स्पष्ट हो रहा था।

रामदास सोरेन की विरासत

रामदास सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर उनकी समृद्ध विरासत को याद करना उचित है। उन्होंने हमेशा समाज सेवा को प्राथमिकता दी और मंत्रिपद से अधिक गर्व मांझी बाबा कहलाने में महसूस किया। उनकी कड़ी मेहनत और समाज के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा ने उन्हें एक प्रेरणादायक नेता बना दिया।

राजनीतिक करियर की शुरुआत

रामदास सोरेन ने 1995 में चुनावी राजनीति में कदम रखा। उन्होंने जमशेदपुर पूर्वी से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन के बाद 2005 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने घाटशिला विधानसभा सीट पर झामुमो के टिकट की उम्मीद की, लेकिन फिर से असफल रहे।

चुनावी सफलता और मंत्री पद

2009 में, रामदास सोरेन ने झामुमो के टिकट पर चुनाव जीतकर अपनी पहली सफलता हासिल की। 2014 में भाजपा के लक्ष्मण टुडू से हारने के बावजूद, उन्होंने 2019 और 2024 में लगातार दो बार घाटशिला सीट पर जीत दर्ज की। 30 अगस्त 2024 को उन्हें पहली बार कैबिनेट में स्थान मिला और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा तथा जल संसाधन विभाग का मंत्री बनाया गया।

स्कूली शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यकाल

चुनाव बाद महागठबंधन को प्रचंड जनादेश मिलने पर 5 दिसंबर 2024 को रामदास सोरेन को स्कूली शिक्षा मंत्री बनाया गया। उनका कार्यकाल सिर्फ 9 महीने का रहा, लेकिन इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत की। उन्होंने 26,000 सहायक आचार्य पदों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की और स्कूल रूअर अभियान 2025 के तहत बच्चों के 100 प्रतिशत नामांकन को सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया।

शिक्षा के प्रति समर्पण

रामदास सोरेन ने शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने घाटशिला प्रखंड में पंडित रघुनाथ मुर्मू विश्वविद्यालय और ट्राइबल म्यूजियम की नींव रखी। इसके साथ ही, स्थानीय और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के प्रति भी उन्होंने गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने 10,000 शिक्षकों की बहाली का प्रस्ताव भी तैयार किया।

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