गुमला में आदिवासी स्वशासन अधिकारों के लिए प्रदर्शन, मांगे सौंपी गईं

गुमला में आदिवासी सरना समुदाय का आंदोलन तेज

गुमला में आदिवासी सरना समुदाय की पारंपरिक सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था और ग्राम स्वशासन से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा के लिए आंदोलन की धारा तेज हो गई है। “रूढ़िजन्य जनजाति समन्वय समिति” के बैनर तले सैकड़ों ग्रामीण गुमला समाहरणालय पहुंचे और उपायुक्त को एक ज्ञापन सौंपा। इस आंदोलन का नेतृत्व संरक्षक निशा उरांव ने किया, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण और पारंपरिक आदिवासी अगुआ शामिल हुए।

ज्ञापन में उठाई गई महत्वपूर्ण मांगें

ज्ञापन में आदिवासी पारंपरिक व्यवस्थाओं जैसे पड़हा और डोकलो सोहर से जुड़ी कई महत्वपूर्ण मांगें रखी गईं। ज्ञापन में यह स्पष्ट किया गया कि पारंपरिक सामाजिक-धार्मिक पदों पर केवल मूल परंपरागत आदिवासी समुदाय के सदस्यों की नियुक्ति की जानी चाहिए। आंदोलनकारियों के अनुसार, धर्मांतरित आदिवासियों की इन पदों पर नियुक्ति से धार्मिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारियों में असंतुलन उत्पन्न हो रहा है, जिससे पारंपरिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

साथ ही, यह भी मांग की गई कि ग्राम सभा की अनुमति के बिना “चांगई सभा” जैसी किसी भी बैठक को अवैध माना जाए, और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया गया। इसके अतिरिक्त, पेसा (PESA) नियमावली के तहत ग्राम सभा की संरचना में अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष जैसे गैर-परंपरागत पदों को थोपे जाने का विरोध किया गया। आंदोलनकारियों ने यह मांग की कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभा का संचालन पूरी तरह से पारंपरिक नियमों और आदिवासी परंपराओं के अनुसार ही किया जाए।

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