विजय उरांव, रांची
झारखंड की महत्वाकांक्षी सुबर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना की प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की धीमी प्रक्रिया है। केंद्र सरकार ने हाल ही में लोकसभा में यह जानकारी दी कि इस परियोजना के लिए किसी विशेष वित्तीय पैकेज पर विचार नहीं किया जा रहा है।
5,862 करोड़ रुपये खर्च, 3,717 करोड़ रुपये का काम शेष
सरकार ने कहा कि सुबर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना को 2016-17 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (PMKSY-AIBP) के तहत देश की 99 प्राथमिकता वाली सिंचाई परियोजनाओं में शामिल किया गया था। परियोजना की संशोधित स्वीकृत लागत 9,579.58 करोड़ रुपये है, जिसमें से अब तक 5,862.20 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
इस परियोजना के बाकी कार्यों की अनुमानित लागत 3,717.38 करोड़ रुपये है। PMKSY-AIBP के तहत इस परियोजना के लिए 1,373.698 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता स्वीकृत की गई है, जिसमें से केवल 756.73 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। शेष 616.968 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता अभी मिलनी बाकी है, जो शेष कार्यों की लागत का लगभग 16.6 प्रतिशत है।
भूमि अधिग्रहण और R&R की धीमी गति से प्रभावित परियोजना
केंद्र सरकार ने बताया कि परियोजना में देरी का मुख्य कारण भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) कार्यों की धीमी प्रगति है। इसी कारण यह परियोजना वर्षों से लंबित है और कोल्हान क्षेत्र के किसानों को आवश्यक सिंचाई सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
हाल ही में सदन में पूछा गया कि यदि झारखंड सरकार विशेष सहायता का प्रस्ताव भेजती है, तो क्या केंद्र विशेष पैकेज देने पर विचार करेगा। इस पर केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अतिरिक्त विशेष पैकेज की संभावना फिलहाल नहीं है। ऐसे में परियोजना की गति अब राज्य सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की प्रक्रिया को तेज करने पर निर्भर करेगी।
सुबर्णरेखा परियोजना का उद्देश्य
सुबर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना झारखंड की प्रमुख सिंचाई एवं जल संसाधन परियोजनाओं में से एक है। यह सुबर्णरेखा नदी और उसकी सहायक खरकई नदी पर विकसित की जा रही एक अंतरराज्यीय परियोजना है, जिसमें झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। इस परियोजना की आधारशिला 1978 में तीनों राज्यों के बीच हुए समझौते के बाद रखी गई थी। इसका उद्देश्य केवल सिंचाई नहीं, बल्कि पेयजल, औद्योगिक जलापूर्ति, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन भी है।
परियोजना के प्रमुख घटकों में चांडिल बांध, इचा बांध, गालूडीह बैराज, गंजिया बैराज और इनसे जुड़े नहर नेटवर्क शामिल हैं। इन संरचनाओं के माध्यम से सुबर्णरेखा और खरकई नदी के जल का नियोजित उपयोग कर कृषि, पेयजल और औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करने की योजना है।
यह परियोजना झारखंड के साथ-साथ ओडिशा और पश्चिम बंगाल के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके पूरा होने पर कोल्हान क्षेत्र के पूर्वी सिंहभूम, पश्चिम सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां सहित आसपास के जिलों में लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। साथ ही, जमशेदपुर, आदित्यपुर और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों के लिए दीर्घकालिक जलापूर्ति सुनिश्चित होगी, जिससे औद्योगिक विकास को समर्थन मिलेगा।
हालांकि, परियोजना की शुरुआत के चार दशक बाद भी भूमि अधिग्रहण, विस्थापित परिवारों के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) और प्रशासनिक देरी के कारण इसे पूरा नहीं किया जा सका है। इसी वजह से इसे 2016-17 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (PMKSY-AIBP) के तहत प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में शामिल किया गया। वर्तमान में, परियोजना की समय पर पूर्णता की सबसे बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास प्रक्रिया ही बनी हुई है।