गिरिडीह: आदिवासी देवा सोरेन जर्जर घर में रहने को मजबूर, आवास योजना से वंचित

गिरिडीह: सरकारी योजनाओं से वंचित आदिवासी व्यक्ति की कहानी

गिरिडीह जिले के तिसरी प्रखंड स्थित मंझिलाडीह गांव में एक आदिवासी व्यक्ति, देवा सोरेन, की दयनीय स्थिति उजागर हुई है। वे आज भी एक जर्जर मिट्टी के घर में रहने को मजबूर हैं, जहां लगातार बारिश के चलते उनका आशियाना कभी भी गिर सकता है। आवास योजना का लाभ न मिलने के कारण उनकी स्थिति और भी गंभीर हो गई है। पत्नी के निधन के बाद अकेले जीवन बिता रहे देवा सोरेन बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनकी कठिनाई ने सरकारी योजनाओं की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बारिश में गिरने का खतरा

देवा सोरेन का घर पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। निरंतर होती बारिश के कारण उनका आशियाना धराशायी होने की कगार पर है। ऐसे खतरनाक हालात में रहने के लिए वे मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। इस घर में न तो गैस चूल्हा है और न ही सोने के लिए बिस्तर। देवा सोरेन केवल दो जोड़ी कपड़ों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं और बारिश के मौसम में मिट्टी को ही बिस्तर बनाने पर मजबूर हैं।

पत्नी के निधन के बाद बढ़ी चुनौतियां

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, देवा सोरेन की पत्नी का निधन हो चुका है, जिसके बाद उनकी मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं। अकेले जीवन यापन करने के कारण उनके पास न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही स्थायी सहारा। उनकी स्थिति यह दर्शाती है कि कई गरीब परिवार आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

आवास योजनाओं से वंचित

यह सबसे बड़ा सवाल है कि आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी देवा सोरेन जैसे जरूरतमंद व्यक्ति को प्रधानमंत्री आवास योजना या अन्य आवास योजनाओं का लाभ नहीं मिला है। आश्चर्य की बात यह है कि उनका नाम लाभार्थियों की सूची में भी नहीं है। पंचायत समिति सदस्य मनोज सोरेन ने बताया कि देवा सोरेन को अब तक कोई आवास योजना का लाभ नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि सरकार गरीबों और आदिवासियों के कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाने का दावा करती है, लेकिन वास्तविकता में स्थिति भिन्न है।

आदिवासी नेतृत्व पर सवाल

यह विडंबना है कि जिस राज्य में आदिवासी नेतृत्व का दावा किया जाता है, वहां एक आदिवासी व्यक्ति सुरक्षित आवास और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। विकास और कल्याणकारी योजनाओं के बड़े दावे किए जाते हैं, जबकि मंझिलाडीह गांव की यह स्थिति प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है। देवा सोरेन की कहानी केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि उन हजारों जरूरतमंदों की हकीकत को उजागर करती है, जो सरकारी योजनाओं का इंतजार कर रहे हैं। अब यह देखना है कि प्रशासन कब उनकी स्थिति को सुधारता है और उन्हें सुरक्षित आवास कब उपलब्ध कराता है।

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