हजारीबाग में 12 वर्षीय बच्ची की हत्या का सनसनीखेज मामला
हजारीबाग: “चोर मचाए शोर” नरबलि की खौफनाक दास्तान
हजारीबाग के विष्णुगढ़ में एक 12 वर्षीय बच्ची की हत्या का मामला सामने आया है, जिसने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है। जिसे लोग न्याय का मसीहा समझ रहे थे, वही मासूम का कातिल निकल आया। यह घटना अंधविश्वास, प्रेम, और धोखे की एक ऐसी कहानी है जिसने मानवता को शर्मसार किया है।
घटना का विवरण: उत्सव के बीच मातम
हजारीबाग जिला रामनवमी के जुलूस की तैयारियों में था, वहीं विष्णुगढ़ प्रखंड के कुसुंभा गांव में एक खौफनाक साजिश चल रही थी। 24 मार्च की रात, जब पूरा गांव उल्लास में था, तभी 12 साल की एक बच्ची अचानक लापता हो गई। अगले दिन उसी गांव के पास एक बांसवाड़ी में उसका क्षत-विक्षत शव मिला।
मुख्य आरोपी का चेहरा: भीम राम की भूमिका
घटना के बाद गांव में आक्रोश फैल गया। इस आक्रोश के पीछे भीम राम का हाथ था, जो भाजपा का बूथ अध्यक्ष और एक प्रभावशाली नेता था। वह मृतका की मां के साथ मिलकर न्याय की मांग कर रहा था।
भीम राम की सक्रियता इस कदर थी कि हजारीबाग के सांसद और विधायक समेत रांची के कई बड़े नेता कुसुंभा गांव पहुंचे। उसने मीडिया के सामने मुख्यमंत्री से दोषियों को सज़ा दिलाने की मांग की, जिससे ध्यान उसकी ओर न जाए।
पुलिस की चुनौती और जांच की दिशा
हजारीबाग पुलिस के सामने एक ओर जहां रामनवमी का संवेदनशील जुलूस था, वहीं दूसरी ओर यह जटिल हत्याकांड। जुलूस के बाद पुलिस ने तकनीकी सर्विलांस और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया। शक की सुई मृतका की मां रेशमी देवी और भीम राम की ओर मुड़ गई।
खुलासा: अंधविश्वास का शिकार मासूम
पुलिस की कड़ी पूछताछ में जो सच सामने आया, उसने सबको चौंका दिया। यह केवल हत्या नहीं थी, बल्कि एक नरबलि का मामला था।
इस साजिश में तीन मुख्य पात्र शामिल थे:
- रेशमी देवी (मां): जिसने अपने बीमार बेटे के इलाज के लिए अपनी बेटी का बलिदान दिया।
- भीम राम (कथित प्रेमी और अपराधी): जिसने अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर मामले को भटकाने की कोशिश की।
- शांति देवी (तांत्रिक): जिसने इस खौफनाक घटना को अंजाम देने के लिए प्रेरित किया।
आरोपियों ने स्वीकार किया कि मृतका के भाई की बीमारी को ठीक करने के लिए तांत्रिक के निर्देश पर बच्ची की बलि दी गई थी।
राजनीति पर असर
इस खुलासे के बाद इलाके में राजनीतिक गतिविधियाँ ठंडी पड़ गई हैं। जो नेता भीम राम के साथ मंच साझा कर रहे थे, उनके पास अब कोई उत्तर नहीं है। यह मामला इस बात का प्रमाण है कि “चोर मचाए शोर” की कहावत यहाँ पूरी तरह सच साबित हुई है।
सामाजिक सवाल
यह मामला कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है:
- क्या समाज में आज भी नरबलि जैसे अंधविश्वास की कोई जगह है?
- अपराधी किस प्रकार राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल कर पुलिस को गुमराह करते हैं?
- क्या मां की ममता के सामने अंधविश्वास का यह रूप महत्वपूर्ण है?

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