झारखंड विधानसभा: 11 साल पहले का सवाल, आज भी उत्तर की खोज जारी

विजय उराँव

झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र 6 अगस्त से प्रारंभ होने जा रहा है, जिसमें विभिन्न विधायक अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं पर सरकार से प्रश्न पूछेंगे। इस संदर्भ में, जानना महत्वपूर्ण है कि उनके प्रश्नों का निपटारा किस प्रकार किया जाता है।

एक संवेदनशील मुद्दे को विधानसभा से लेकर अपराध अनुसंधान विभाग (CID) तक पहुंचने में कितना समय लग सकता है? आश्चर्यजनक रूप से, झारखंड में एक मामले को CID तक पहुंचने में लगभग 11 वर्षों का समय लग गया है।

2015 की विधानसभा कार्रवाई की पृष्ठभूमि

इसकी शुरुआत वर्ष 2015 में हुई जब झारखंड विधानसभा में लापता बच्चों के मामलों पर चर्चा की गई। उस समय के विधायक प्रदीप यादव ने पूछा था कि 2005 से 2014 के बीच लापता हुए 1177 बच्चों का अब तक कोई पता नहीं चला है। यह सवाल मानव तस्करी से जुड़ा था।

इस पर तत्कालीन गृह मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा ने जानकारी दी थी कि 2005 से 2014 के बीच राज्य में 3829 बच्चे लापता हुए थे, जिनमें से 2546 बच्चों को बरामद किया गया, जबकि 1281 बच्चे अब भी गायब हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 675 मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई है और जांच जारी है।

11 वर्ष बाद मामला फिर से उठाया गया

अब, 2015 में उठाए गए इस मुद्दे पर CID ने सभी जिलों से 2005 से 2014 के बीच लापता बच्चों का पूरा रिकॉर्ड मांगा है। CID ने 24 जुलाई 2026 को सभी जिला पुलिस अधीक्षकों और रेल एसपी को निर्देश दिया कि वे दो दिनों के भीतर संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इस रिपोर्ट में यह जानकारी दी जाएगी कि कितने बच्चे लापता हुए, कितने बरामद हुए और कितने अभी भी गायब हैं।

गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने विधानसभा में दिए गए आश्वासनों का अद्यतन जानकारी मांगी थी, जिसके बाद CID ने यह कार्रवाई की। इससे स्पष्ट होता है कि 11 साल पहले उठाई गई यह समस्या अब भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

विभिन्न लंबित आश्वासनों का लेखा-जोखा

गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने न केवल लापता बच्चों के मामलों का अद्यतन मांगा है, बल्कि अन्य लंबित आश्वासनों पर भी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इनमें 2014 में आदिवासी समूहों के खिलाफ मुकदमे निरस्त करने, 2024 में आदिवासी जमीन पर अवैध कब्जे की जांच, और मानव तस्करी से जुड़े मामलों का समावेश है।

सरकार की इस प्रक्रिया ने यह सवाल उठाया है कि विधानसभा में दिए गए आश्वासनों के समाधान में इतना समय क्यों लग रहा है, विशेष रूप से जब यह मुद्दा सैकड़ों लापता बच्चों और उनके परिवारों से संबंधित है।

विधानसभा आश्वासन का महत्व

विधानसभा का आश्वासन ऐसी गारंटी है जो किसी मंत्री द्वारा सदन में दी जाती है और यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा होता है। जब विधायक किसी जनहित के मुद्दे पर सवाल उठाते हैं और मंत्री उस पर कार्रवाई का आश्वासन देते हैं, तो यह सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह अपने वादों को पूरा करे। विधानसभा की आश्वासन समिति इस प्रक्रिया की निगरानी करती है।

अब भी कई सवालों के जवाब जरूरी

– 11 वर्षों में सरकार ने क्या किया?
– विधानसभा में आश्वासन का अद्यतन लेने में इतना समय क्यों लगा?
– क्या यह केवल औपचारिकता है या पुराने मामलों की फिर से जांच की जाएगी?
– 675 एफआईआर में कितने मामलों में चार्जशीट दायर हुई और कितनों को सजा मिली?
– 2005 से 2014 के बीच लापता बच्चों में से कितने अभी भी गायब हैं?
– मानव तस्करी से जुड़े मामलों में क्या कार्रवाई हुई?
– 11 वर्षों की इस देरी की जिम्मेदारी कौन लेगा?

हालांकि फाइल का 11 साल बाद खुलना एक महत्वपूर्ण घटना है, लेकिन असली परीक्षण अब शुरू होगा। सरकार को केवल विधानसभा में अद्यतन नहीं देना है, बल्कि यह भी बताना होगा कि वर्षों से लंबित मामलों में न्याय दिलाने के लिए वे क्या ठोस कदम उठाएंगे।

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