दो दिवसीय ‘जलवायु महोत्सव’ का आगाज, कल्पना सोरेन ने किया उद्घाटन

रांची के ऐतिहासिक ऑड्रे हाउस में ‘जलवायु अखड़ा’ का आयोजन बुधवार को प्रारंभ हुआ। इस दो दिवसीय कार्यक्रम का उद्घाटन विधायक कल्पना सोरेन ने पौधों में जल अर्पित कर किया। इस अवसर पर राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए 400 से अधिक प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और न्यायसंगत बदलाव से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की।

उद्घाटन सत्र में कल्पना सोरेन ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष छोटे और निरंतर प्रयासों से ही संभव है। उन्होंने झारखंड के आदिवासी और मूलवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि इससे राज्य की प्राकृतिक धरोहर को संरक्षित करने में मदद मिलेगी। इस दिशा में सरकार, सामाजिक संगठनों, विशेषज्ञों और आम लोगों जैसे सभी हिस्सेदारों को एकजुट करना आवश्यक है।

झारखंड की जलवायु कहानी के विविध पहलू

सारथी नेटवर्क के संस्थापक सदस्य जॉन्सन टोप्पो ने कहा कि ‘जलवायु अखड़ा’ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास है। उन्होंने स्पष्ट किया कि झारखंड की जलवायु कहानी केवल कोयला, सौर ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन तक सीमित नहीं है। इसके अंतर्गत बदलती वर्षा, वन अधिकार, पारंपरिक खान-पान, स्थानीय आजीविका और खनन से जुड़ी नई अर्थव्यवस्था के निर्माण जैसे पहलू भी शामिल हैं।

असर की सीईओ वीनूता गोपाल ने कहा कि जस्ट ट्रांजिशन का मुद्दा केवल कोयले से अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ने का नहीं है, बल्कि यह समावेशी विकास का प्रश्न है। उन्होंने बताया कि कोयले पर निर्भरता कम हो रही है, लेकिन हरित निवेश और रोजगार के नए अवसर सीमित हैं। नीतियों में उन समुदायों की आवाज को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो जंगलों, कृषि और मजदूरी पर निर्भर हैं।

कार्यक्रम में नाबार्ड की सीजीएम दीपमाला घोष, वन विभाग के पीसीसीएफ ए.टी. मिश्रा, और जेएसएलपीएस की सीईओ अनन्या मिश्रा समेत कई विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।

विविध विषयों पर होगी चर्चा

इस दो दिवसीय आयोजन में पारंपरिक खान-पान, स्थानीय अर्थव्यवस्था, दामोदर नदी, जैव विविधता, वन अधिकार, कोयले से अक्षय ऊर्जा की ओर बदलाव और जलवायु न्याय जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी। वक्ताओं ने जस्ट ट्रांजिशन में रोजगार, कृषि, वनोपज, एग्रोफॉरेस्ट्री और स्थानीय मूल्य श्रृंखला को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। रामगढ़ और गिरिडीह के ‘सोलर दीदी’ मॉडल को इस संदर्भ में एक सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इसके अलावा, कार्यक्रम में पेंटिंग और छायाचित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें जेंडर, जलवायु परिवर्तन, खनन, विस्थापन और पर्यावरणीय संकट से संबंधित कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया।

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