बसंत पंचमी पर बाबा धाम में गुलाल की रंगत, भोलेनाथ के तिलकोत्सव की रही धूम

गीत, नृत्य, गाजे-बाजे के साथ अबीर-गुलाल खेलते हुए बाबा को तिलक चढ़ाया गया

देवघर। बसंत पंचमी पर आज मां सरस्वती की विशेष आराधना के साथ बैद्यनाथ धाम में भोलेनाथ के तिलकोत्सव की भी धूम है। इस मौके पर यहां मिथिलावासी भगवान को शंकर को विधि-विधान, गीत, नृत्य, गाजे-बाजे के साथ बाबा संग अबीर-गुलाल खेलते हुए उन्हें तिलक चढ़ाए। यह भगवान शंकर के साथ मिथिलावासियों की नातेदारी का उत्सव है। इस कारण श्रद्धा भक्ति के साथ हंसी-ठिठोली, गुलाल की होली, गीत-भजन और थोड़े से प्यारभरे हुड़दंग की भी छूट है। भगवान शिव को तिलक चढ़ाने मिथिला के तिलकहरू दो दिन पहले ही अलग-अलग इलाकों से बाबाधाम पहुंच चुके थे। आज सुबह से ही यहां श्रद्धा के साथ लोग आनंद के सागर में भी गोते लगाते दिखे। इस मौके पर हर ओर गुलाल की ही रंगत देखने को मिली। बाबा बैद्यनाथ के दरबार की कथा निराली है। मिथिलावासी सदियों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। भारतीय सभ्यता में बहू-बेटियों और बहनों को प्यार, सम्मान व उपहार देने की परंपरा है। घर में जब भी कोई खुशहाली या त्योहार का मौका आता है तो घरवाले उन्हें याद करते हैं। संदेश भेजते हैं। बाबा बैद्यनाथ को तिलक चढ़ाने के पीछे भी यही कहानी है। तिरहूत अर्थात मिथिलांचल हिमालय की तराई में बसा है। यहां के लोगों का मानना है कि हमलोग हिम राजा की प्रजा हैं। ऐसे में पार्वती के पिता हिमराज के दामाद भोलेनाथ मिथिलावासियों के भी दामाद हैं और तिलक चढ़ाने आए तिलकहरू उनके साले। बसंत पंचमी के दिन मंदिर उन्हीं के हवाले रहता है। उन्हें भोलेनाथ के साथ गुलाल की होली खेलने में या पूजा करने व अन्न-धन चढ़ाने में कोई बाधक नहीं बनता। बाबा के तिलकोत्सव के बाद फिर महाशिवरात्रि पर बाबा की बरात में फिर ऐसी रौनक और रंगत देखने को मिलेगी। मिथिलवासियोंके बसंत पंचमी में देवघर आने की परंपरा प्राचीन है। यह परंपरा बनी रहे और इसे बनाए रखने की जरूरत है। सरकार और जिला प्रशासन इनका पूरा ख्याल रखता है। पूजा-अर्चना से लेकर इनके आवासन वाले स्थान पर पेयजल, अलाव और रोशनी का पूरा इंतजाम किया जाता है। सुरक्षा को लेकर दिन रात पुलिस गश्त तेज कर दी गई है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top